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कविता – मुझे दो आज़ादी !

तुम्हारे गढ़े समाज कीनज़रों में नज़रबंदसवालो की सलाखों मेंकैद मेरी रूह कोदे दो आज़ादी मौत तो मेरे बस में नहींमुझे दे दो जीने की आज़ादी चाहे मुंडन करवा लूंया हो जाउूं जटाधारीदे दो आज़ादीअपना सर बचाने की घुमूं नंग-धड़ंगदिखावे के सजावटी कपड़ों सेकर दो आज़ाद मुझे मर्दऔरत याकुछ और हो जाउूंदे दो आज़ादीलिंग-मुक्त हो जाने …

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